UPI MDR विवाद: UPI ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लगाने को लेकर पिछले कुछ दिनों से सियासी हलकों में जोरदार बहस चल रही है। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने में लगी है, लेकिन इसी बीच एक ऐसा दावा सामने आया है जो कांग्रेस के लिए ही असहज सवाल खड़े कर रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक मैसेज में कहा गया है कि संसद की स्टैंडिंग कमिटी ऑन फाइनेंस की एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि बिना MDR के UPI सिस्टम को चलाना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है, और इस कमिटी में कांग्रेस के भी सांसद शामिल थे।
आइए समझते हैं कि आखिर इस पूरे विवाद की जड़ में क्या है, कमिटी की रिपोर्ट में क्या दर्ज है, और अब तक सामने आए दस्तावेजों से क्या तस्वीर बनती है।
जीरो MDR पॉलिसी से शुरू हुई कहानी
संसदीय दस्तावेजों के मुताबिक, 1 जनवरी 2020 से भारत सरकार ने RuPay डेबिट कार्ड और UPI ट्रांजैक्शन के लिए जीरो MDR पॉलिसी लागू की थी। इसका मकसद डिजिटल पेमेंट को सस्ता और आसान बनाना था, ताकि देश में कम-कैश अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सके।
MDR वह फीस होती है जो मर्चेंट अपने बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के बदले चुकाता है। यह फीस ट्रांजैक्शन प्रोसेसिंग, सेटलमेंट और डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने की लागत वसूलने में मदद करती है।
दस्तावेजों में क्या दर्ज है
सामने आए संसदीय रिपोर्ट के पन्नों के मुताबिक, वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने अपने लिखित जवाब में यह बात मानी थी कि:
- MDR न होने की वजह से UPI इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाए रखना मुश्किल हो रहा है।
- इसी वजह से बैंकों को RuPay डेबिट कार्ड और UPI ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 तक एक इंसेंटिव स्कीम चलाई, जिसका नाम था “Incentive Scheme for Promotion of RuPay Debit Cards and Low-Value BHIM UPI transactions (P2M)”।
- इस स्कीम को जारी रखना, आम नागरिकों को बिना रुकावट UPI सेवा देने के लिए जरूरी बताया गया था।
कमिटी ने क्या सिफारिशें दीं
रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में कमिटी ने भविष्य के हिसाब-किताब को लेकर भी अपनी राय दी है। दस्तावेज के मुताबिक:
- UPI आने वाले समय में हर महीने करीब 150 अरब ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर सकता है और इससे लगभग 60 करोड़ नए यूजर जुड़ सकते हैं।
- मौजूदा सरकारी इंसेंटिव, इंडस्ट्री की असल लागत का सिर्फ 11% और संभावित MDR कलेक्शन का महज 14% ही कवर करता है।
- इससे एक बड़ा फंडिंग गैप बन रहा है, जो लंबे समय में इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को प्रभावित कर सकता है।
इसी आधार पर कमिटी ने सुझाव दिया कि:
- तीन साल की मल्टी-ईयर स्कीम और कैशबैक जैसे कॉम्पोनेंट, छोटे शहरों (टियर 3 से 6) में डिजिटल पेमेंट को बढ़ाने के लिए जरूरी हैं।
- लेकिन साथ ही, वित्तीय सेवा विभाग को एक ऐसा सेल्फ-रिलायंट और टियर्ड रेवेन्यू मॉडल भी तलाशना चाहिए, जिससे UPI इकोसिस्टम बिना सरकारी खजाने पर लगातार बोझ डाले, आर्थिक रूप से टिकाऊ बन सके।
बैंकिंग सेक्टर पर भी टिप्पणी
रिपोर्ट के इसी हिस्से में कमिटी ने भारतीय बैंकिंग सेक्टर की स्थिति पर भी बात की है। दस्तावेज के मुताबिक:
- सरकारी बैंकों (PSBs) ने वित्त वर्ष 2024-25 में अब तक का सबसे ज्यादा मुनाफा दर्ज किया, जो करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये रहा।
- ग्रॉस NPA घटकर 2.05% पर आ गया, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
- सरकार का लक्ष्य क्रेडिट-टू-GDP रेशियो को मौजूदा करीब 57% से काफी ऊपर ले जाना है, जिसके लिए एक हाई-लेवल कमिटी बनाई गई है।
- इसके साथ ही सरकारी बैंकों में FDI लिमिट को 49% तक बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि स्टॉक वैल्यूएशन को बेहतर किया जा सके।
- कमिटी ने AI और मशीन लर्निंग के तेज इस्तेमाल की सिफारिश भी की है।
कमिटी में कौन-कौन शामिल था
वायरल हो रहे दावे के मुताबिक, स्टैंडिंग कमिटी ऑन फाइनेंस में कांग्रेस के भी सांसद शामिल थे। संसदीय दस्तावेज के अनुसार, कमिटी की 21वीं बैठक 11 मार्च 2026 को संसद भवन के कमिटी रूम समन्वय-3 में हुई थी, जिसकी अध्यक्षता श्री भर्तृहरि महताब ने की।
बैठक में मौजूद सांसदों में लोकसभा से:
- श्री अरुण भारती
- श्री पी. पी. चौधरी
- श्री लावु श्री कृष्णा देवरायलु
- श्री सुरेश कुमार कश्यप
- थिरु अरुण नेहरू
- श्री एन. के. प्रेमचंद्रन
- डॉ. सी. एम. रमेश
- प्रो. सौगत रॉय
- श्री पी. वी. मिधुन रेड्डी
- डॉ. के. सुधाकर
- श्री मनीष तिवारी
- श्री बालाशौरी वल्लभनेनी
- श्री प्रभाकर रेड्डी वेमिरेड्डी
जबकि राज्यसभा से:
- श्री नारायण दास गुप्ता
- श्री येरम वेंकट सुब्बा रेड्डी
- श्री एस. सेल्वागणपति
- श्री संजय सेठ
- डॉ. दिनेश शर्मा
- श्रीमती दर्शना सिंह
- श्री प्रमोद तिवारी
इनमें से कुछ सांसद कांग्रेस पार्टी से जुड़े बताए जाते हैं।
दावा — किसी दल ने दर्ज नहीं कराया असहमति नोट
सोशल मीडिया पर चल रहे मैसेज में यह दावा किया गया है कि जब कमिटी ने अपनी 32वीं रिपोर्ट संसद में पेश की थी, तो विपक्षी या कांग्रेस के किसी भी सांसद ने इस पर असहमति (dissent) नोट दर्ज नहीं कराया था। हालांकि, यह बात केवल इस वायरल मैसेज में कही गई है — इसकी पुष्टि करने वाला कोई अलग आधिकारिक दस्तावेज सीधे तौर पर सामने नहीं आया है। रिपोर्ट के जो हिस्से उपलब्ध हैं, उनमें कमिटी की सिफारिशें और DFS का जवाब तो साफ दिख रहा है, लेकिन असहमति नोट को लेकर अलग से कोई पेज सामने नहीं आया है।
सरकार का MDR पर स्टैंड और कांग्रेस का विरोध
वायरल मैसेज में यह भी दावा किया गया है कि जब मोदी सरकार ने UPI पर चार्ज को लेकर कदम बढ़ाया, तो इसका आधार इसी 32वीं स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट को बताया गया। मैसेज में सवाल उठाया गया है कि अगर कांग्रेस के सांसद खुद इस कमिटी का हिस्सा थे और उन्होंने तब कोई विरोध दर्ज नहीं कराया, तो अब पार्टी इसी मुद्दे पर सरकार को क्यों घेर रही है।
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इसी के साथ मैसेज में यह भी माना गया है कि UPI पर किसी भी तरह का चार्ज आम आदमी के लिए बोझ जैसा साबित हो सकता है, और इसमें सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है। लेकिन सवाल यह उठाया गया है कि विपक्ष ने यह आवाज तब क्यों नहीं उठाई, जब रिपोर्ट संसद में पेश हो रही थी।
क्यों जरूरी है यह पूरा मुद्दा समझना
- डिजिटल पेमेंट का भविष्य: UPI आज देश के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट सिस्टम में से एक है, और इस पर कोई भी नीतिगत बदलाव सीधे करोड़ों यूजर्स को प्रभावित करता है।
- बैंकों और सरकार के बीच संतुलन: बिना MDR के सिस्टम चलाना बैंकों के लिए महंगा साबित हो रहा है, जबकि MDR लगाना आम यूजर या मर्चेंट पर बोझ बन सकता है।
- राजनीतिक जिम्मेदारी: अगर कमिटी में शामिल सांसदों ने रिपोर्ट पर सहमति जताई थी, तो अब उसी मुद्दे पर राजनीति करना पारदर्शिता के सवाल खड़े करता है।
UPI पर MDR का मुद्दा जितना तकनीकी है, उतना ही राजनीतिक भी बन गया है। एक तरफ डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की आर्थिक सेहत का सवाल है, तो दूसरी तरफ यह भी देखना जरूरी है कि जब संसदीय कमिटी में यह मुद्दा उठा था, तब किस-किस दल ने क्या रुख अपनाया। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मामले में आगे क्या फैसला लेती है और कांग्रेस अपने ही सांसदों की भूमिका पर क्या जवाब देती है।