चंडीगढ़: उत्तर भारत के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार PGIMER (PGI) चंडीगढ़ को लेकर आम जनता के मन में एक भरोसा रहता है। लोगों को लगता है कि यहाँ कम खर्च में देश का सबसे बेहतरीन इलाज मिल जाएगा। इसी उम्मीद में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर से हर दिन सैकड़ों गर्भवती महिलाएँ डिलीवरी के लिए यहाँ पहुँचती हैं। लेकिन क्या वाकई डिलीवरी केस के लिए PGI जाना एक सुरक्षित फैसला है?
हाल ही में सामने आई एक ज़मीनी हकीकत और खुद वहाँ काम करने वाले मेडिकल स्टाफ के अनुभव यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि सिर्फ थोड़े से पैसे बचाने के चक्कर में कहीं लोग अपने नवजात बच्चे और माँ की ज़िंदगी को दांव पर तो नहीं लगा रहे?
लेबर रूम की खौफनाक हकीकत: एक बेड पर तीन-तीन गर्भवती महिलाएँ
PGI के लेबर रूम में कदम रखते ही ‘बेहतरीन इलाज’ का भ्रम टूट जाता है। यहाँ सुविधाओं की कमी और मरीजों की भीड़ का आलम यह है कि एक-एक बेड पर तीन-तीन गर्भवती महिलाओं को लेटाया जाता है। जगह कम पड़ने के कारण कई महिलाओं को डिलीवरी जैसे नाज़ुक और दर्दनाक समय में भी ज़मीन पर लेटना पड़ता है। यह न केवल अमानवीय है, बल्कि जच्चा और बच्चा दोनों के लिए बेहद खतरनाक इंफेक्शन (संक्रमण) का कारण बन सकता है।
दो-दो दिन तक दर्द से तड़पाना और डॉक्टरों का लापरवाही भरा रवैया
अक्सर देखा जाता है कि यहाँ डॉक्टर आखिरी वक्त तक सिजेरियन (ऑपरेशन) करने से बचते हैं। इसके चक्कर में गर्भवती महिलाओं को दो-दो दिन तक लेबर पेन (प्रसव पीड़ा) की दवाएँ देकर तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब मरीज़ असहनीय दर्द से चिल्ला रहा होता है और ऑन-ड्यूटी डॉक्टर उसे देखने के बजाय लंच या ब्रेक पर चले जाते हैं। जब मरीज़ की हालत पूरी तरह बिगड़ने लगती है, तब जाकर आनन-फानन में ऑपरेशन किया जाता है, जिससे माँ और बच्चे दोनों की जान जोखिम में पड़ जाती है।
जब अस्पताल का खुद का ‘नर्सिंग स्टाफ’ भी सुरक्षित नहीं
सबसे ज्यादा हैरान और परेशान करने वाली बात यह है कि यह बदहाली सिर्फ आम जनता के साथ नहीं होती। PGI में काम करने वाली नर्स और इंटरनल स्टाफ भी जब खुद गर्भवती होकर वहाँ एडमिट होती हैं, तो उन्हें भी इसी प्रताड़ना और अव्यवस्था से गुज़रना पड़ता है। जब यह संस्थान अपने ही स्टाफ को एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण डिलीवरी की सुविधा नहीं दे पा रहा, तो दूर-दराज से आने वाली आम जनता के साथ क्या होता होगा, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।
‘नो रिफ्यूजल पॉलिसी’ बन चुकी है मुसीबत
PGI एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है, इसलिए यहाँ नियम है कि इमरजेंसी या लेबर रूम में आने वाले किसी भी मरीज़ को वापस नहीं भेजा जा सकता। इस ‘No Refusal Policy’ के कारण अस्पताल में क्षमता से पांच गुना ज्यादा मरीज़ भर जाते हैं। जब डॉक्टर और बेड सीमित हों और मरीज़ों की संख्या हज़ारों में, तो चाहकर भी हर मरीज़ को सही देखभाल और समय पर इलाज मिलना नामुमकिन हो जाता है।
अंतिम फैसला: पैसा ज़रूरी है या अपनों की जान?
इसमें कोई शक नहीं कि PGI में सीनियर डॉक्टर्स बहुत काबिल हैं, लेकिन वहाँ का भारी दबाव और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी पूरे सिस्टम को लाचार बना देती है।
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यदि आपके परिवार में कोई डिलीवरी केस है, मरीज़ की हालत स्थिर है, और आप थोड़ा भी खर्च उठा सकते हैं, तो सिर्फ पैसे बचाने की चाहत में PGI के इस नरक जैसे लेबर रूम का हिस्सा बनने से बचें। चंडीगढ़ में ही GMSH-16 या GMCH-32 जैसे अन्य सरकारी विकल्प मौजूद हैं, या फिर किसी अच्छे प्राइवेट अस्पताल का रुख करें। याद रखिए, पैसा दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन किसी अपने की ज़िंदगी और सेहत से समझौता नहीं किया जा सकता।