Parvinder Singh Jhota को जालंधर में ‘बाबा बॉक्सर’ के नाम से जाना जाता था। जानिए उनके बॉक्सिंग करियर, निजी संघर्ष और नशे के खिलाफ अभियान की कहानी।
पंजाब के मानसा में गोली लगने से जान गंवाने वाले परविंदर सिंह झोटा की जिंदगी कई उतार-चढ़ाव से गुजरी। कभी जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज में एक प्रतिभाशाली बॉक्सर के रूप में पहचाने जाने वाले झोटा को उनके साथी ‘बाबा बॉक्सर’ कहकर बुलाते थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी मुक्केबाजी में हिस्सा लिया, लेकिन खेल में आगे बढ़ने का उनका सपना पूरा नहीं हो सका। बाद के वर्षों में वह नशे की लत से जूझे और फिर इसी समस्या के खिलाफ आवाज उठाने लगे।
उनके पिता भीम ने बेटे के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि झोटा को पढ़ाई के साथ खेल में भी दिलचस्पी थी। दोस्तों के मुताबिक, वह क्रिकेट भी अच्छा खेलते थे। हालांकि, उनकी जिंदगी में एक ऐसा दौर आया जब वह नशे की गिरफ्त में आ गए। बाद में उन्होंने इस मुश्किल दौर से निकलकर नशे के खिलाफ अभियान चलाना शुरू किया।
अब मानसा में एक केमिस्ट की दुकान पर नशे को लेकर हुए विवाद के बाद गोली लगने से उनकी मौत हो गई। घटना का प्रसारण झोटा के फेसबुक पेज पर लाइव हुआ, जिसके बाद मामला चर्चा में आ गया।
जालंधर के कॉलेज में बनी ‘बाबा बॉक्सर’ की पहचान
परविंदर सिंह झोटा की शुरुआती पढ़ाई नॉन-मेडिकल विषयों में हुई थी। उनके पिता भीम के मुताबिक, उन्होंने बठिंडा के एक कॉलेज में दाखिला लिया था। वहां करीब एक साल पढ़ने के बाद झोटा को महसूस हुआ कि उनकी रुचि किसी दूसरे क्षेत्र में है। उन्होंने अपने पिता से खेलों में आगे बढ़ने की इच्छा जताई।
भीम ने बताया कि बेटे की रुचि को देखते हुए उन्होंने उसे जालंधर भेज दिया। वहां झोटा ने बीएससी कोर्स में दाखिला लिया। लायलपुर खालसा कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी पहचान एक अच्छे बॉक्सर के रूप में बनी। खेल में उनके प्रदर्शन के कारण दोस्त उन्हें ‘बाबा बॉक्सर’ के नाम से जानते थे।
झोटा ने राष्ट्रीय स्तर पर भी मुक्केबाजी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। उनके पिता के अनुसार, वह खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें उम्मीद के मुताबिक अवसर नहीं मिल सके।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं ले पाए हिस्सा
भीम ने बताया कि कुछ कारणों से झोटा विदेश में होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन में हिस्सा लेने नहीं जा सके। उनकी जगह एक जूनियर बॉक्सर को देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। उस खिलाड़ी ने प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता और बाद में हरियाणा में पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी बना।
पिता ने बताया कि वह कभी-कभी झोटा से कहते थे कि अगर खेल में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलता, तो कम से कम पुलिस में कांस्टेबल बन जाएं। हालांकि, भीम के अनुसार, वह बेटे से इस विषय पर ज्यादा बातचीत नहीं करते थे।
झोटा के दोस्तों ने उनके खेल कौशल को याद करते हुए बताया कि मुक्केबाजी के अलावा उन्हें क्रिकेट में भी दिलचस्पी थी। इस तरह उनके जीवन का शुरुआती दौर पढ़ाई और खेल के इर्द-गिर्द रहा।
नशे की लत से उबरकर उसी के खिलाफ उठाई आवाज
झोटा की जिंदगी में बाद में मुश्किल दौर आया, जब वह नशे का सेवन करने लगे। उनके दोस्तों के अनुसार, उन्होंने इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश की और आखिरकार नशे के खिलाफ अभियान से जुड़ गए।
जिस समस्या ने कभी उनकी जिंदगी को प्रभावित किया था, बाद में उसी के खिलाफ उन्होंने आवाज उठानी शुरू कर दी। वह मेडिकल स्टोरों पर नशीले पदार्थों की कथित अवैध बिक्री के मुद्दे को उठाने के लिए जाने जाते थे। उनके इस अभियान के कारण उन्हें पंजाब में नशे के खिलाफ सक्रिय रहने वाले व्यक्ति के रूप में पहचान मिली।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में उनके नशे की लत से उबरने के समय और उनके अभियान की शुरुआत से जुड़ी विस्तृत तारीखें नहीं दी गई हैं।
मानसा में विवाद के बाद गोली मारकर हत्या
परविंदर सिंह झोटा की जिंदगी का अंत मंगलवार को मानसा में हुई गोलीबारी की घटना में हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, एक केमिस्ट की दुकान पर नशे को लेकर हुए विवाद के बाद उन्हें गोली मार दी गई। इस घटना का वीडियो उनके फेसबुक पेज पर लाइव प्रसारित हुआ।
घटना के बाद इलाके में नाराजगी देखी गई। झोटा की मौत ने नशे के खिलाफ उनके अभियान और पंजाब में नशीले पदार्थों की समस्या को लेकर फिर चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, घटना के संबंध में किसी भी आरोप को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले पुलिस जांच और आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।
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Parvinder Singh Jhota की कहानी खेल में आगे बढ़ने के सपने, निजी संघर्ष और नशे के खिलाफ उनकी मुहिम के अलग-अलग पड़ाव दिखाती है। उनके जीवन के बारे में पिता और दोस्तों की यादें उनके शुरुआती खेल करियर और बाद के बदलावों को सामने लाती हैं। मानसा में हुई गोलीबारी के मामले में आगे की जांच से संबंधित जानकारी सामने आने का इंतजार है।