पंजाब बंद के दौरान लुधियाना में यूपी-बिहार के मजदूरों को निशाना बनाने की विचलित करने वाली वीडियो सामने आई हैं। मूकदर्शक बनी पुलिस प्रशासन।
पंजाब के लुधियाना से हाल ही में आई तस्वीरें और वीडियो केवल विचलित करने वाले नहीं हैं, बल्कि वे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और सरकार के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा हैं। प्रदर्शन और ‘बंद’ के नाम पर सड़कों पर जो नंगा नाच देखने को मिला, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इस देश में कानून की लाठी सिर्फ कागज़ों पर चलती है, ज़मीन पर तो केवल दबंगों का खौफ राज करता है।
क्या था बंद का कारण?
यह पूरा विवाद और पंजाब बंद का आह्वान मानसा जिले में नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की दिनदहाड़े हुई बेरहमी से हत्या के विरोध में किया गया था। ड्रग्स माफियाओं और अवैध मेडिकल स्टोर के खिलाफ लगातार मुहिम चलाने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता की सुरक्षा करने में नाकाम रही पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जनता में भारी आक्रोश था। परविंदर सिंह झोटा के परिवार और विभिन्न संगठनों ने इंसाफ की मांग को लेकर इस बंद का आयोजन किया था।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नशा माफियाओं और कानून की नाकामी के खिलाफ शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन खुद कानून को अपने हाथ में लेने का जरिया बन सकता है?
पेट की आग बनाम सियासत का खेल
तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे चंद हुड़दंगी अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए उन गरीब मजदूरों, दिहाड़ीदारों और रेहड़ी-पटरी वालों को निशाना बना रहे हैं, जो सुबह उठते ही इस चिंता में डूब जाते हैं कि आज शाम उनके घर का चूल्हा जलेगा या नहीं।
एक आम कर्मचारी, जो किसी दुकान पर चंद रुपयों की तनख्वाह के लिए काम कर रहा है, उसका उस दुकान के खुलने या बंद रहने के फैसले से क्या लेना-देना? वह तो सिर्फ अपने परिवार का पेट पालने के लिए वहाँ खड़ा है। दुकान का मालिक घर पर सुरक्षित बैठा है, लेकिन मार कौन खा रहा है? वह गरीब मजदूर, जो उत्तर प्रदेश या बिहार से अपना गाँव-घर छोड़कर, अपनों की खुशियों के लिए पंजाब में पसीना बहाने आया है। क्या किसी बाहरी राज्य से आकर ईमानदारी की रोटी कमाना इस देश में अपराध बन गया है?
मूकदर्शक बनी पुलिस: शर्म से डूब जाने का वक्त
सबसे ज़्यादा शर्मनाक और डराने वाली बात यह है कि जहाँ ये हिंसा हो रही थी, वहाँ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी उठाने वाली पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी थी। जब वर्दी की मौजूदगी में गरीबों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जा रहा हो, तो आम नागरिक का प्रशासन पर से भरोसा उठना लाज़मी है।
क्या हमारी पुलिस सिर्फ रसूखदारों को सुरक्षा देने के लिए है? कानून का डर दंगाइयों के दिलों में क्यों नहीं है? सरकार और राज्य प्रशासन को इस बात पर डूब मरना चाहिए कि वे अपने राज्य में काम करने वाले सबसे कमज़ोर और मेहनतकश तबके को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट को लेना होगा कड़ा संज्ञान
देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने बार-बार अपने ऐतिहासिक फैसलों में कहा है कि किसी भी संगठन या समूह को ‘जबरन बंद’ बुलाने या आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने का कोई अधिकार नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान से जीने और आजीविका कमाने का अधिकार देता है।
जब राज्य सरकारें राजनीति और वोट बैंक के चक्कर में पंगु हो जाती हैं, तब न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद बचती है। समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस घटना का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) ले और दोषी हुड़दंगियों के साथ-साथ उन लापरवाह पुलिस अधिकारियों पर भी ऐसी कड़ी कार्रवाई का आदेश दे, जो तमाशा देखते रहे।
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गरीबों और प्रवासियों के खून-पसीने पर पलने वाले समाज को यह सोचना होगा कि अगर हम आज इस अन्याय पर चुप रहे, तो कल कानून का यह जनाज़ा किसी के भी घर के सामने से निकल सकता है। सरकार को अपनी नींद से जागना होगा, पीड़ितों को न्याय देना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि पंजाब की धरती पर फिर कभी किसी गरीब की लाचारी का ऐसा क्रूर मज़ाक न उड़ाया जाए।