मौरल पुलिसिंग या सरेआम गुंडागर्दी? जमुई कांड और नेताओं के शर्मनाक बयानों पर सुलगता देश

जमुई कांड: बिहार के जमुई जिले में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले दो नाबालिग छात्रों के साथ सड़क पर हुई कथित बदसलूकी का मामला चर्चा में है। कोचिंग से लौट रहे एक लड़के और लड़की को कुछ लोगों ने रास्ते में रोक लिया। इसके बाद दोनों के साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार किया गया। घटना का वीडियो भी बनाया गया, जो बाद में सोशल मीडिया पर सामने आया।

जमुई कांड में नाबालिगों से बदसलूकी के मामले का प्रतीकात्मक दृश्य

मामले के सामने आने के बाद लोगों में नाराजगी देखी गई। इस पूरे घटनाक्रम ने सिर्फ कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती तथाकथित ‘मॉरल पुलिसिंग’ और पीड़ितों को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने वाली सोच पर भी बहस छेड़ दी है।

जमुई कांड में नाबालिगों को रास्ते में रोकने का मामला

सामने आई जानकारी के मुताबिक, दोनों नाबालिग कोचिंग से वापस लौट रहे थे। इसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया। आरोप है कि उनके साथ मारपीट की गई और लड़की के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया।

घटना का वीडियो बनाए जाने और उसके सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला व्यापक चर्चा में आया। ऐसे मामलों में सबसे अहम सवाल यही है कि किसी व्यक्ति या भीड़ को सड़क पर किसी दूसरे नागरिक को रोककर उसके निजी जीवन के बारे में पूछताछ करने और कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार आखिर किसने दिया?

पीड़ितों से सवाल क्यों, आरोपियों से नहीं?

इस घटना के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में कुछ ऐसे सवाल भी उठे जिनमें लड़की के रात करीब 7 बजे वहां मौजूद होने और वहां किसी रिश्तेदार के रहने जैसी बातों को मुद्दा बनाया गया।

लेकिन किसी घटना की जांच का आधार पीड़ित की मौजूदगी का समय या उसके रिश्तेदारों की जानकारी नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति के साथ अपराध हुआ है, तो जिम्मेदारी अपराध करने वाले की तय होनी चाहिए।

यही वजह है कि जमुई की घटना ने ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ यानी पीड़ित को ही दोष देने वाली सोच पर भी सवाल खड़े किए हैं।

नेताओं के बयानों पर भी उठे सवाल

घटना के बाद कुछ राजनीतिक बयानों ने विवाद को और बढ़ा दिया। जमुई की स्थानीय विधायक और भाजपा नेता श्रेयसी सिंह ने कथित तौर पर कहा कि ‘मॉरल पुलिसिंग’ को बेहतर या शालीन तरीके से किया जा सकता था।

इस बयान को लेकर यह सवाल उठाया गया कि सड़क पर किसी नाबालिग लड़के और लड़की को रोकना, उनसे पूछताछ करना या उनके साथ हिंसा करना किसी भी स्थिति में आम लोगों का अधिकार कैसे हो सकता है।

वहीं, JDU के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और बिहार सरकार के कुछ मंत्रियों की ओर से घटना को ‘छुटपुट’ या ‘छिटपुट घटना’ बताए जाने को लेकर भी सवाल उठे। आलोचना करने वालों का कहना है कि नाबालिगों से जुड़ी ऐसी घटना को मामूली बताने के बजाय संवेदनशीलता और कानून के मुताबिक कार्रवाई पर जोर होना चाहिए।

कार्रवाई के बाद भी कई सवाल बाकी

सोशल मीडिया पर मामला सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी नंदन यादव समेत पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों पर POCSO एक्ट के तहत कार्रवाई की जानकारी दी गई है।

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हालांकि, इस घटना ने एक बड़ा सामाजिक सवाल भी सामने रखा है। बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा का समाधान उनके आने-जाने के समय या उनकी आजादी पर सवाल खड़े करना नहीं, बल्कि कानून का पालन सुनिश्चित करना है।

किसी भी सभ्य समाज में अपराध की जिम्मेदारी पीड़ित पर डालने के बजाय आरोपियों की जवाबदेही तय होना जरूरी है। जमुई कांड इसी सवाल को एक बार फिर सामने लाता है कि सड़क पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और आम लोगों को कानून हाथ में लेने से कैसे रोका जाए।

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