वाघ बकरी टी ग्रुप के चेयरमैन पीयूषभाई देसाई का 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। चाय कारोबार से छह दशक से अधिक समय तक जुड़े रहे देसाई ने परिवार के चाय व्यवसाय को गुजरात से आगे ले जाने और देश के कई राज्यों में विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई। वाघ बकरी टी ग्रुप ने एक बयान जारी कर उनके निधन की जानकारी दी। उनका निधन 15 सितंबर को हुआ।
पीयूषभाई देसाई कारोबार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी, परोपकार और महात्मा गांधी के विचारों से जुड़े अपने दृष्टिकोण के लिए भी जाने जाते थे। चाय के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता के साथ-साथ गुणवत्ता, ईमानदारी, लंबे समय के कारोबारी रिश्तों और सामूहिक विकास पर उनका जोर रहा।
छह दशक से ज्यादा समय तक चाय कारोबार से जुड़े रहे पीयूषभाई देसाई
वाघ बकरी टी ग्रुप के अनुसार, देसाई छह दशकों से अधिक समय तक चाय व्यापार से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने कंपनी की गुजरात से बाहर मौजूदगी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसे कई राज्यों तक पहुंचाने में योगदान दिया।
चाय की गुणवत्ता को समझने और परखने में भी उन्हें विशेषज्ञ माना जाता था। गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन अयंगर ने उन्हें एक ऐसे उद्यमी के तौर पर याद किया, जिनके काम और जीवन में महात्मा गांधी के विचारों की झलक दिखाई देती थी।
अयंगर के मुताबिक, देसाई पूरी तरह अपने दम पर आगे बढ़े थे और खुद एक बेहतरीन चाय टेस्टर थे।
गांधी के विचारों से रहा गहरा जुड़ाव
पीयूषभाई देसाई का गांधीवादी सोच से संबंध उनके परिवार के इतिहास से भी जुड़ा था। उनके दादा दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी से मिले थे। इसी पारिवारिक जुड़ाव के कारण देसाई के जीवन में गांधी के ट्रस्टीशिप के विचार, लोगों की मदद करना और सादगी से जीवन जीना महत्वपूर्ण रहे।
वाघ बकरी नाम के पीछे की सोच को भी देसाई गांधी के अहिंसा के संदेश से जोड़कर देखते थे।
सुदर्शन अयंगर ने बताया कि देसाई के अनुसार, ऐसी जगह जहां बाघ और बकरी एक ही स्थान पर पानी पी सकें, वह अहिंसक समाज का प्रतीक है। उनके मुताबिक, इसी विचार ने वाघ बकरी ब्रांड के पीछे मौजूद सामाजिक संदेश को भी एक अलग पहचान दी।
गुजरात विद्यापीठ और सामाजिक पहलों से जुड़े रहे
पीयूषभाई देसाई गुजरात विद्यापीठ से भी लंबे समय तक जुड़े रहे और गांधीवादी विचारों से संबंधित कई पहलों में योगदान दिया।
वाघ बकरी टी ग्रुप के शोक संदेश के अनुसार, देसाई अनुवाद फाउंडेशन के संस्थापक निदेशकों में शामिल थे। यह फाउंडेशन नारायण देसाई के साथ मिलकर सेक्शन 8 कंपनी के तौर पर स्थापित किया गया था। उस समय नारायण देसाई गुजरात विद्यापीठ के चांसलर थे।
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सुदर्शन अयंगर भी इस फाउंडेशन के निदेशक रहे। फाउंडेशन के दो प्रमुख उद्देश्य बताए गए थे। पहला, गांधीजी की बची हुई रचनाओं और महादेवभाई देसाई की डायरी का अनुवाद करना। दूसरा, अच्छी साहित्यिक और ज्ञानवर्धक सामग्री का एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में सीधे अनुवाद को बढ़ावा देना, जिसमें अंग्रेजी या हिंदी को बीच की भाषा न बनाया जाए।
पीयूषभाई देसाई के निधन के साथ वाघ बकरी टी ग्रुप ने ऐसे कारोबारी व्यक्तित्व को खो दिया, जिसने लंबे समय तक चाय कारोबार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और गांधीवादी मूल्यों को भी अपने काम का हिस्सा बनाए रखा।