चंडीगढ़ या ‘धरनागढ़’: जब दो राज्यों की राजनीति में बंधक बन जाता है ‘द सिटी ब्यूटीफुल’

चंडीगढ़, जिसे दुनिया भर में ‘द सिटी ब्यूटीफुल’ के नाम से जाना जाता है, अपनी बेहतरीन प्लानिंग, हरियाली और शांति के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन पिछले कुछ सालों में इस शहर की यह पहचान धुंधली पड़ती जा रही है। आज ट्रिसिटी (चंडीगढ़-मोहाली-पंचकुला) के आम नागरिक सुबह उठकर अखबारों में खबरों से ज्यादा ट्रैफिक एडवाइजरी ढूंढते हैं। बार-बार होने वाले धरनों, चक्का जाम और बैरिकेडिंग को देखकर अब लोग व्यंग्य में पूछने लगे हैं—“क्या चंडीगढ़ अब ‘धरनागढ़’ बन चुका है?”

चंडीगढ़ में धरनों से ट्रैफिक संकट, ‘धरनागढ़’ पर सवाल

आम जनता का दर्द: रोज़ की परेशानी

सितंबर 2026 में ही हुए हालिया किसान महाधरने और सरकारी कर्मचारियों के 18% महंगाई भत्ते (DA) के आंदोलनों ने शहर की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। जब भी पंजाब से कोई बड़ा संगठन मार्च निकालता है, तो मोहाली-चंडीगढ़ बॉर्डर छावनी में बदल जाता है।

  • दफ्तर जाने वाले लोग घंटों जाम में फंसते हैं।
  • एंबुलेंस और मरीजों को रास्ता बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
  • स्कूली बच्चे समय पर घर नहीं पहुंच पाते।
    किसी भी लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन करना सबका अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि दूसरों के अधिकारों की कीमत पर यह कब तक जायज है?

सिर्फ पंजाब के ही धरने क्यों? (Why Only Punjab?)
चंडीगढ़ के नागरिकों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि हमेशा पंजाब के लोग ही शहर को घेर कर क्यों बैठते हैं, जबकि हरियाणा की तरफ से ऐसा माहौल नहीं दिखता। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:

  1. पावर सेंटर का फर्क: हरियाणा सरकार ने अपने अधिकांश बड़े मुख्यालय और प्रशासनिक विभाग पंचकुला में शिफ्ट कर दिए हैं। इसलिए हरियाणा के प्रदर्शन पंचकुला में ही सिमट जाते हैं। इसके विपरीत, पंजाब का मुख्यमंत्री आवास, राजभवन और सचिवालय आज भी मुख्य चंडीगढ़ (सेक्टर 1 से 6) में हैं, जिससे प्रदर्शनकारियों का सीधा निशाना चंडीगढ़ होता है।
  2. पुलिस की रणनीति: पंजाब पुलिस अक्सर प्रदर्शनकारियों को उनके गृह जिलों में रोकने के बजाय मोहाली बॉर्डर तक आने देती है, जिससे कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी और वित्तीय बोझ चंडीगढ़ पुलिस (केंद्र सरकार) के पाले में आ जाता है। वहीं, हरियाणा पुलिस आंदोलनकारियों को बहुत पहले ही रोकने में सख्त रुख अपनाती है।

वित्तीय बोझ और सुरक्षा पर खर्च

इन धरनों के कारण चंडीगढ़ प्रशासन का करोड़ों रुपये का बजट सिर्फ सुरक्षा, बैरिकेडिंग, रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में खर्च हो जाता है। यह वह पैसा है जो शहर के विकास, पार्कों के रख-रखाव और जनसुविधाओं पर खर्च होना चाहिए था। इसके अलावा, बॉर्डर सील होने से स्थानीय व्यापार और अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचता है।

हाई कोर्ट का सख्त रुख और समाधान की उम्मीद

इस गंभीर स्थिति पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा है कि सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। प्रशासन ने अब सेक्टर 25 की रैली ग्राउंड जैसी जगहें तय की हैं, लेकिन जब तक राजनीतिक दल और यूनियनें खुद जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक जमीनी हालात बदलना मुश्किल है।

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चंडीगढ़ किसी एक राज्य का नहीं, बल्कि लाखों आम नागरिकों का घर है जो शांति से जीना चाहते हैं। राजनीतिक रोटियां सेकने और अपनी मांगें मनवाने के लिए पूरे शहर को बंधक बना लेना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है। केंद्र सरकार, पंजाब सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन को मिलकर एक ऐसी ठोस नीति बनानी होगी ताकि प्रदर्शनकारियों की आवाज भी सुनी जाए और ‘द सिटी ब्यूटीफुल’ की आत्मा यानी उसकी शांति और सुंदरता भी सुरक्षित रहे। अन्यथा, यह शहर कागजों पर चंडीगढ़ और लोगों की जुबान पर हमेशा के लिए ‘धरनागढ़’ बनकर रह जाएगा।

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