पाकिस्तान ने सऊदी अरब के अनुरोध को ठुकराया, हूतियों के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने से इनकार

सऊदी अरब की ओर से यमन के हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान से मदद मांगे जाने की खबर है। पाकिस्तान ने कथित तौर पर इस अनुरोध को ‘मक्का रक्षा समझौते’ के तहत अपनी जिम्मेदारी के दायरे में नहीं माना है। इस्लामाबाद का तर्क है कि यह समझौता पहले से चल रहे युद्धों पर लागू नहीं होता और इसकी शर्तें समझौते पर हस्ताक्षर के बाद शुरू होने वाले युद्धों से जुड़ी हैं।

‘मक्का रक्षा समझौते’ को लेकर पाकिस्तान का तर्क

पाकिस्तान के मुताबिक, समझौता उन परिस्थितियों के लिए है जो इसके साइन होने के बाद पैदा होती हैं। इसके अलावा, इसकी शर्तों को सरकारी सैन्य बलों की ओर से किए गए हमलों तक सीमित बताया गया है।

इसका मतलब यह है कि प्रॉक्सी या मिलिशिया समूहों से जुड़े हमलों को इस समझौते के तहत उसी तरह नहीं देखा जाता।

इसी आधार पर पाकिस्तान ने यमन में हूतियों के खिलाफ चल रही लड़ाई में शामिल होने के सऊदी अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है।

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

जब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से पूछा गया कि तुर्की और सऊदी अरब के साथ किए गए इस समझौते के तहत इस्लामाबाद अपनी जिम्मेदारियां किस तरह निभाएगा, तो मंत्रालय की ओर से कहा गया कि “अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है।”

विदेश मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया कि गठबंधन को आगे बढ़ाने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

तुर्की भी इस समझौते का तीसरा हस्ताक्षरकर्ता देश है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उसने भी इस मामले में कोई कदम नहीं उठाया है।

सऊदी अरब को अमेरिका से भी नहीं मिली मदद

इस घटनाक्रम के बीच सऊदी अरब को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भी दो बार इनकार का सामना करना पड़ा है। अब पाकिस्तान के पीछे हटने से सऊदी अरब की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं।

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‘मक्का रक्षा समझौते’ का मूल उद्देश्य यह है कि समझौते में शामिल किसी देश पर हमला होने की स्थिति में उसे अन्य सदस्य देशों पर हमला माना जाए। हालांकि, पाकिस्तान ने यमन के मौजूदा संघर्ष को इस व्यवस्था के दायरे में मानने से इनकार किया है।

हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ खोला मोर्चा

स्रोत में दी गई जानकारी के अनुसार, हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोल रखा है। बाब अल-मंडेब और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के बंद होने का भी इसमें उल्लेख किया गया है।

ऐसे में पाकिस्तान के इस रुख को सऊदी अरब के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है।

फिलहाल पाकिस्तान और तुर्की की ओर से इस मामले में सैन्य गठबंधन को आगे बढ़ाने के संकेत नहीं दिए गए हैं।

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