UP Hookah Ban: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के युवाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य के सभी होटलों, रेस्तरां और कैफे में हुक्का बार के संचालन और हुक्का परोसने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर बने निर्धारित स्मोकिंग एरिया (Designated Smoking Areas) में भी ग्राहकों को हुक्का नहीं परोसा जा सकता।
लेकिन, कानून की इस सख्त बंदिश से इतर, यह फैसला कानूनी इतिहास में एक बेहद भावुक और अनोखी वजह से दर्ज हो गया है। फैसले के आखिरी पन्नों पर जस्टिस शेखर बी. सराफ ने “तंबाकू धूम्रपान के साथ मेरा अनुभव” शीर्षक के तहत एक स्वरचित कविता लिखी है, जिसमें उन्होंने खुद की सिगरेट की लत और उससे उबरने के संघर्ष को बयां किया है।
फैसला: व्यापार के अधिकार से बड़ा है ‘स्वच्छ हवा का अधिकार’
93 पन्नों के इस विस्तृत फैसले में कोर्ट ने रेस्तरां मालिकों की उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें हुक्का परोसने को सिर्फ एक उपकरण किराए पर देना बताया गया था।
- अनुच्छेद 21 बनाम अनुच्छेद 19: कोर्ट ने कहा कि आम नागरिकों का सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ हवा में सांस लेने का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21), किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के व्यापार करने के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) से कहीं ऊपर है।
- लाइसेंस पर रोक और पुलिस को खुली छूट: कोर्ट ने साफ किया कि खाद्य सुरक्षा विभाग या नगर पालिकाओं के पास हुक्का बार के लिए अलग से लाइसेंस जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। पुलिस को नियमों का उल्लंघन करने वालों पर छापेमारी, सामग्री जब्त करने और सख्त कानूनी कार्रवाई करने की पूरी शक्ति दी गई है।
जब जज की कलम से निकली दर्दभरी कविता: “युवा उबलते हुए मेंढक न बनें”
फैसले के पैराग्राफ 64 में जस्टिस शेखर बी. सराफ ने अपने जीवन के उस हिस्से को सामने रखा जिसे अक्सर लोग छिपाते हैं। उन्होंने देश की युवा पीढ़ी को इस जानलेवा लत से बचाने के लिए अपनी न्यायिक औपचारिकता को दरकिनार कर दिल से बात की।
उन्होंने कविता के जरिए लत के उस चक्रव्यूह को समझाया जिससे हर युवा गुजरता है:
- लॉ स्कूल के दिनों की शुरुआत: उन्होंने लिखा कि जब वह लॉ स्कूल आए थे, तो सुबह की ओस की तरह मासूम थे। गेट पर सिगरेट फूंकने वाले सीनियरों को देखकर वह मन ही मन हंसते थे और उन्हें ‘कमजोर इच्छाशक्ति’ वाला समझते थे। लेकिन वह खुद एक दिन इस जाल में फंस गए।
- ‘सिर्फ मजे के लिए’ पहली शुरुआत: एक सीनियर ने उन्हें ‘सिर्फ मजे के लिए’ एक तंबाकू (चली/गुटका) ऑफर किया। एक सैनिक की तरह खुद को बहादुर समझते हुए उन्होंने उसे चख लिया।
- भ्रम कि ‘सब कंट्रोल में है’: धीरे-धीरे यह आदत खरगोशों की तरह बढ़ती चली गई। उन्होंने खुद से झूठ बोला कि वह तो बस कभी-कभार पीने वाले (Social Smoker) हैं और सब कुछ उनके नियंत्रण में है। लेकिन देखते ही देखते बात ‘एक सिगरेट’ से बढ़कर ‘पूरा पैकेट खरीदने’ तक पहुंच गई।
- शरीर का विद्रोह और टूटे वादे: इसके बाद शुरू हुआ रातों का खांसी का दौर, गले में बलगम का जमावड़ा, मानो गला कोई दलदल बन गया हो। निकोटीन पैच और च्युइंग गम के जरिए लत छोड़ने की हर कोशिश नाकाम रही। नए साल के संकल्प धूल फांकते रहे।
कविता की आखिरी पंक्तियों में उन्होंने युवाओं को सीधे चेतावनी देते हुए लिखा है:
“पहली सिगरेट एक मासूम और हानिरहित समय जैसी लगती है,
पर यह वैसी होती नहीं है। मेरी बातों पर नहीं, अपनी उस खांसी पर भरोसा करो।
बीस साल की उम्र में, अकड़ से भरे, खुद को आज़ाद समझने वाले युवाओं—
उस बेवकूफ की तरह मत बनो जो शुरुआत में हंसता रहा, और अंत में (गर्म पानी में) उबलता हुआ मेंढक बन गया।”
एक मिसाल बनता फैसला
अदालत ने इस फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजकर इसे तुरंत और सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश सिर्फ एक कानूनी रोक नहीं है, बल्कि न्याय की कुर्सी पर बैठे एक जज की ओर से देश के युवाओं के नाम लिखा गया एक बेहद संवेदनशील ‘पब्लिक सर्विस नोट’ भी है। कानून के साथ-साथ आत्म-अनुभव की यह सीख निश्चित रूप से हुक्के और सिगरेट के धुएं में अपनी जिंदगी उड़ा रहे युवाओं की आंखें खोलने का काम करेगी।